ज़रा रुक कर तो सोचो by Saket Kumar

सांझ तले जब पत्तों से पटे रास्तों से गुज़रा
लगा जैसे बहती हवा भी कुछ कह रही है
ज़िन्दगी की इस दौड़ में क्या मंज़िल है तुम्हारी
ज़रा रुक कर तो सोचो।

बदल गया है जहाँ, बदल ये सारे मंज़र गए हैं
बदल गयी है राहें, बदल इमारतें गयी हैं
कब था वो आखिरी बार जब तुमने ठहर कर उन लम्हों को याद किया था
ज़रा रुक कर तो सोचो।

कैसा वो जहाँ था, जब माँ कहती थी
बेटा बड़ा हो जा, इतना बचपना भी ठीक नहीं
माँ का तो वह लाड़ था
उम्र से पहले बड़े होने के चक्कर में कहीं ज़िन्दगी जीना तो नहीं भूल गए
ज़रा रुक कर तो सोचो।

रंगमंच ही तो है यह दुनिया, तू भी बस एक अभिनेता है
डोर तो कहीं और है तुम्हारी, कोई और तेरा रचियता है
जिसे खोना है एक दिन, कही उससे अनचाहा नेह तो नहीं लगा बैठे
ज़रा रुक कर तो सोचो।

किसी में खामियां तो बड़ी जल्दी निकाल लेते हो
समाज में फ़ैली विसंगतियों पर तर्क तो बहुत कर जाते हो
उन्हें दूर करने के लिए कभी खुद कोई कदम उठाया है
ज़रा रुक कर तो सोचो।

हर इंसान अच्छा भी है और बुरा भी,
तुम क्यों इतनी आसानी से अच्छे और बुरे का तमगा दे देते हो
जितनी शिद्दत से दूसरों को परखा है
कभी खुद को परखने की कोशिश भी की है
ज़रा रुक कर तो सोचो।

जलता तो सूरज भी रहता है सदा ही दूसरों के लिए
तंज उसपर फिर भी कैसे जाते हैं
तुम्हें थोड़ी सी फ़टकार क्या मिल जाए
दूसरों के लिए अच्छा करने की ख्वाहिश ही क्यों छोड़ देते हो
ज़रा रुक कर तो सोचो।

किसी बदलाव के पैरोकार बड़ी जल्दी बन जाते हो
पर उसे पूरा करने के लिए किसी और के कदम बढ़ाने का इंतज़ार करते हो
अगर ऐसा हुआ की वो बदलाव तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा हो, तो,
ज़रा रुक कर तो सोचो।

हर मुसीबत के सामने घुटने टेक देते हो
हर मुश्किलों से तुरंत हार मान जाते हो
जितने हौसलों की बात तुम करते हो,
क्या उस हौसले से कभी मुश्किलों का सामना किया है
ज़रा रुक कर तो सोचो।

सारा खेल इस नज़रिये का है,
इसे बदल दो तो दुनिया बदल जाएगी
दूरियां ख़त्म हो जाएंगी, शिकायतें मिट जाएंगी
इसी नज़रिये का तो खेल है कि हर दुःख में भी ख़ुशी है
या कहो की हर ख़ुशी में भी दुःख का बसेरा हैं
ज़िन्दगी की राहों में तुम इतनी बार मुड़े हो,
कभी नज़रिये को मोड़ कर देखा है
ज़रा रुक कर तो सोचो।

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