शायद एक दिन

शायद एक दिन

सिग्नल से लगी गाड़ियां

पिघल जाएगी

चिपक जाएगी सड़क से,

कुछ लोग निकलेंगे उसमें से

दिशाहीन अधमरे से;

थामेंगे हाथ एक दूसरे का

और पूछेंगे

समय जो

घड़ियों में दम तोड़

दिया करता है,

देखेंगे अपना गायब होता

मानवीय बिम्ब

आंखों में एक भिखारी के;

पूछेंगे शायद अपने आप से

अपना नाम फिर से

ढूंढनी जो होगी

अपनी ही कब्र आखिर

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