मृत्यु का स्वागत by Girish Shashtri

आज ख़ुश हूँ मैं कि लोग आयेंगें मेरे घर पर 
और बैठेंगें चारों ओर मेरे।
पूछेंगें मेरे बारे में करेंगें बातें सभी एक दूसरे से ।
बस अफसोस अगर होगा मुझे तो यही कि 
मुझसे कर ही लेते गुफ्तगू जब मैं ज़िंदा था
तो आज आने की ज़रूरत ही ना पड़ती शायद ।
मैं बोल सकूँगा ही नहीं तब वरना यही कहता सबसे 
काश ! जब बोला करता था, तब आते तो कुछ बतियाते ।
दो बातें होती। दो लोगों की मुलाकातें होती इसी बहाने 
पूछते इक दूज़े का हाल और कहते दिल की बात।
ख़ैर , नही हो पाया ये कोई बात नही बस ख़ुशी तो तब दोगुनी होगी जब,
मुझे नहलाया जायेगा, छिड़का जायेगा गुलाब का इत्र और पहनाए जायेंगें नये श्वेत वस्त्र।
मैं आनन्दित हो मुस्कुराऊँगा नये वस्त्र पहन
पर तब मैं कैसे बतलाऊँगा उन्हे
कैसे शुक्रिया अदा करूँगा ।
लेकिन मैं फिर भी आतुर हूँ 
करने को मृत्यु का स्वागत। 
शायद नये वस्त्रों के लिए ही या 
फिर ये, कि मेरे अपनों का मेरे घर आने के लिए ।
पता नहीं,…..कुछ भी हो ।
लेकिन मैं फिर भी आतुर हूँ 
करने को मृत्यु का स्वागत।
करने को मृत्यु का स्वागत।।

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