बियाबान

बियाबान में जो आज एक फूल महका है
खालीपन के उसलूब में मुख़्तलिफ़ के जैसा हैं।

रियाध तो फूलों से इब्तिदा होता हैं
बेचारे बियाबान को कहाँ कभी मिले ये इनायत, फूल को,
कभी सच मानकर खुश होता है,
कभी तसव्वुर मानकर दुखी होता है।

एक फूल खिला हैं तो सहेज कर रखता हैं।
बियाबान अय्यार भँवरे से खूब लड़े,
लिहाज़ ख़ुद का ज़मीन पर रखके ,
कभी आफ़ताब से मदद मांगे, कभी हवाओं को सदाएँ दे।
पंछियों को खुश देख खुद खुश होता है
नाग फनी की जलन देख दुखी होता है ।

शब आये तो फूल को कहकांशा का तिजारत बुनता है।
मयस्सर रहना फूल के लिए,
कुछ ऐसे वादे चाँद से लेता है कुछ चकोर से लेता है।
बियाबान चाँद और चकोर के वादों से खुश होता है।
फिर दुनियॉ भुलाकर दोनों को एक दूसरे में खोता देख दुखी होता है।

बियाबान अब सपने देखने लगा है।
कभी अपने मक़तूल ज़हन में ज़िन्दगी तलाशें,
कभी बंजर लिहाफ के नीचे अपना वजूद टटोले।
सेहरा अब रियाध बनकर दिखाएगा, सोचकर ये खुश होता है,
और बदली से अपनी पुरानी दुश्मनी को सोचकर दुखी होता है।

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