पंछी की प्रीत

◆ ◆ ◆【  पंछी  की  प्रीत   】◆ ◆ ◆

एक पंछी को मिल गयी आदमी की आवाज ..
सोचा उसने करें .. किसी आदमी से प्रीत ..
यूँ हुई शुरू .. उनकी बातचीत ..।

ऊँचे भवन की बालकनी में जाकर ..
★ – आइये .. कुछ बात करें .. बोला चहचहा कर ~ ~
◆ – मेरा नाम है सेठ दौलतराम .. बताओ क्या है तुम्हारा नाम ?
प्रश्न सुनकर पंछी चकराया .. क्या होता है नाम समझ न पाया ..
★ – पूछा ~ सर क्या होता है नाम ..
हमारी दुनिया में तो .. चलता है .. इसके बिना ही सारा काम ..।
सुन कर दौलतराम इतराया ..
बिल्कुल अज्ञानी है .. सोच के मुस्काया ..
◆ – बोला ~ अरे तुझे तो पता नहीं है .. मेरा बहुत बङा नाम है ..
जो भी आये सामने .. करता सलाम है ..।

★ – सलाम से क्या होता है .. ?
◆ – सलाम से हम खुश होते हैं ..।

★ – आपके खुश होने के कारण अजीब हैं ..
बिना सलाम के .. आप खुश नहीं होते हैं .. ?
पर हम तो .. बिना नाम और सलाम के ..
हरदम खुश ही रहते हैं .. नाचते हैं , गाते हैं ..
क्या आप भी कभी .. नाचते गाते हैं .. ?

◆ – हम समझदार और बङे हैं .. अरे ये फालतू और बच्चों की बातें हैं ..
★ – पर आपके कदम .. शराब के नशे में .. तो अक्सर डगमगाते हैं ..।

सोचा आदमी ने बदली जाये बात .. इसकी बातें तो करती हैं आघात ..
◆ – किस मोहल्ले में रहते हो .. क्या है तेरा पता .. ?
मकान खुद का है .. या किराये का .. ये तो बता .. ।

सुनकर प्रश्न पंछी शरमाया .. क्या है प्रश्न .. ये समझ ना पाया ..
दौलतराम ने चमकीला सा कार्ड .. जेब से निकाल कर दिखाया..
★- सर.. क्या लिखा है बताइये .. आप ही पढकर सुनाइये ..
पता ठिकाना क्या होता है .. आप ही समझाइये ..।
◆ – अरे तू तो पढा लिखा नहीं है .. मैं ही बताता हूँ  .. सुन ~
‘ सेठ दौलतराम ‘
”  धन भवन , 99 चिंता गली ..
उदासियों का मोहल्ला ,  तनाव नगर  ”
ये है मेरा ठिकाना .. अब बोल ~ कहाँ है .. तेरा ताना बाना ?
★ –  सर आप..पहले तो हँसी गली .. खुशियों के मोहल्ले में रहते थे ..
कब से शिफ्ट कर लिया .. ?
पर हमारा तो ~ ~  ना पता .. ना ठिकाना .. ना गाँव ..
जहाँ भी देखी हरियाली और छाँव .. वहीं पर रख दिये पाँव ..।

अहंकार में चूर .. आदमी देखता है जैसे ..
पूछा सेठ ने  ~  तेरे पास कितने हैं पैसे .. ?

मन ही मन .. सोचने लगा पंछी बेचारा ..
आदमी की तो जात ही अजीब है .. इसकी तो हर बात ही अजीब है ..
★बोला ~ न तो हम पहनते कपड़े .. न होती जेब और न रखते पैसे ..
फिर भी .. रहते नहीं हम नंगे ..।
पर आदमी तो .. उजले कपड़े पहनकर भी .. रहते हैं नंगे ..
सर ~ परमात्मा ने तो आपको मनन की शक्ति दी ..
खुद को आप कहते भी सर्वश्रेष्ठ हो ..
पर आपलोग तो मनन को भूल गये .. हनन की करते रहते तैयारी ..
ये कैसी आपकी समझदारी .. ?
उजले कपड़े पहनकर मंदिर जाते हो ..
जिसने आपको बनाया  ~  आप उसी को बनाते हो ..
धन्यवाद देते नहीं .. रोज फरियाद सुनाते हो ..
उसके नाम पर .. करते हो कितने ही फसाद ..
उसके प्रेम की भाषा .. रखते नहीं हो याद ..
उसके भी नाम पर आप करते हैं दुकान ~ सच में आप हैं कितने महान !!

◆ अरे ~ छोटे से पंछी हो .. तुम क्या जानो भगवान की बातें ..
कौन से प्रेम की बात करते हो .. क्या होते हैं रिश्ते नाते ..
तुम क्या जानो .. हमारी बातें .. ?
★ सर .. मैं छोटा .. अज्ञानी ..
मुझे कर दीजिये माफ .. पर बात ये कर दीजिये साफ ..
क्या आपका सबसे गहरा प्रेम है जिनसे .. वो नहीं हैं कागज के नोट ..
जिनके लिये आ जाती है .. आप लोगों के मन में खोट ..
कैसे रिश्ते .. कैसे नाते  ~  ये तो लगतीं है .. ऊपर की बातें ..
असल बात तो है कुछ और  ~ क्या आपने कभी किया है गौर ..
कि निर्जीव वस्तुओं के लिये .. आप लोग नष्ट कर देते जीवन ..
ये कैसा हो गया है आपका मन  ~  क्या ये नहीं है आपका पतन .. ?

हालात अब बर्दाश्त के बाहर जा रहा था ..
छोटा सा पंछी .. आदमी को उसकी जात बता रहा था ..
धीरे से .. पंछी के मुँह से निकली आवाज ~
★ सर .. ये आपने .. शराफत कब से छोड़ दी .. ?
तिलमिलाया, क्रोध में आया ~ और .. पंछी की गर्दन मरोड़ दी .. !!

काश ये पंछी .. आदमी की आवाज ना पाता ..
आदमी से प्रीत लगाने की बात .. दिल में ना लाता ..
आदमी को  ~  उसकी .. असली सूरत ना दिखाता ..
तो अब भी ये नाचता और गाता .. अब भी ये नाचता और गाता ..!!

पास ही मौजूद दृष्टा .. सारा नजारा देखकर सोचने लगा ~
काश ये आदमी ~ पंछी के इशारे को समझ पाता ..
काश ये आदमी ~ खुद को प्रकृति का एक अंश मान पाता ..
काश ये आदमी ~ सदा अपने और राम के बीच .. काम को ना लाता ..
काश ~ ~ ये जीते जी .. अहंकार को छोड़ पाता ..
काश ~ ~ ये प्रकृति के नृत्य को .. पहचान पाता ..
तो ये भी ~ सदा खुश रहता .. नाचता और गाता ..
ये भी  सदा खुश रहता .. नाचता और गाता .. !!!!

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