जननी by Sanjay Bothra

विलंब कर रहा था छलनी ह्रदय को,

जकड़ रखा था आशाओं को मजबूती से,

चहकेगा बचपन कभी तो इस आँगन,

गूंजेंगी लोरियां, पूरे होंगे अधूरे स्वप्न।

प्रतीक्षा हुई पूरी, बरसा सौभाग्य मेघ बन,

चिर आकांक्षा की पूर्ति छलकी गर्वित मुख पर,

पोर पोर काया का इठलाया अपने भाग्य पर,

सुनी ईश्वर ने, हो द्रवित किया अंततः उपकृत।

खुशियाँ फैलीं, नई उमंग ले रही हिलोर,

बिटिया लेकर आई हरियाली चहुँ ओर,

मनआंगन में नाचा मदमस्त मोर,

अल्हड़ हर शाम, पुलकित हुई हर भोर।

जननी होने का गौरव तब ज्ञात हुआ,

जब आहट सुनाने में देर की संतान ने,

न होता सब कुछ माँबाप का ही कृत्य,

अहसान कुछ कम नहीं तेरा भी बिटिया।

2 Comments

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      Sanjay Kumar Bothra

      आपके वाह जी वाह ने दिल के तार झंकृत कर दिए। धन्यवाद।

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