कुछ देख परख…

कुछ देख परख के लाउ, या बिन देखे अपनाऊं मैं;

कुछ शब्दों के अलफाज़ों से, या आँखों से बतलाऊँ मैं;

कुछ दबे से एहसासों को, या हर जस्बात कह जाऊँ मैं;

कुछ लव्ज़ों में सिमटुं, या कोरा कागज़ बन रह जाऊँ मैं;

कुछ पंखुडियां गुलाब की, या मुर्झाई डाली पाऊँ मैं;

कुछ औरों के अंदाजों को , या हाल अपना कहजाऊँ मैं;

कुछ उलझे से रिश्तों को, या अपनी उलझन सुलझाऊँ मैं;

कुछ अपनों की मर्ज़ी के खातिर, या अपनी चाहत का पाऊँ मैं;

कुछ देख परख के लाऊँ, या बिन देखे अपनाऊं मैं।

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