कुछ खोज रही हूँ। By नमिता एस कल्ला

namita-kalla
आदमी में आदमियत कहीं खोज रही हूँ
जाने क्यूँ में एक पाक नीयत खोज रही हूँ

गुमशुदा हुई है इंसानियत अरस पहले
क्यूँ हैवनो की महफ़िल में , जन्नत खोज रही हूँ
आश्कों से भरी इस भीड़ में घूम
खुद हँसे, औरों को हँसायें, ऐसी एक तबियत खोज रही हूँ
जो फकत दौलत से न मिले अब अपने लिए वोह इज्ज़त खोज रही हूँ।
आदमी में आदमियत कहीं खोज रही हूँ
जाने क्यूँ में एक पाक नीयत खोज रही हूँ

लियाकात को मेरी आज़मा ले जो
में अपने लिए वह मुसीबात खोज रही हूँ
हर हार को अपनी जीत में बदलदे
बस ऐसी एक नुसरत खोज रही हूँ
आदमी में आदमियत कहीं खोज रही हूँ
जाने क्यूँ में एक पाक नीयत खोज रही हूँ

किसी भी सूरत में जो अपनी सी लगे
में ऐसी एक सीरत खोज रही हूँ
मेरी हर घफ्लत जो हँस के माफ़ करे
आज अपने लिए वोह मोहबात खोज रही हूँ
आदमी में आदमियत कहीं खोज रही हूँ
जाने क्यूँ में एक पाक नीयत खोज रही हूँ

नापाक इस महोल में, मैं
ठिकाना -इ – इफ्फत खोज रही हूँ
खुदा की पनाह जो दिला दे
ऐसी इक इमारत खोज रही हूँ
आदमी में आदमियत कहीं खोज रही हूँ
जाने क्यूँ में एक पाक नीयत खोज रही हूँ

मतलब से भरी इस दुनिया में
ग़ैरों के लिए इबादत खोज रही हूँ
जो अंजाम दे एक नए आगाज़ को
एक ऐसी आकिबत खोज रही हूँ
आदमी में आदमियत कहीं खोज रही हूँ
जाने क्यूँ में एक पाक नीयत खोज रही हूँ

7 Comments

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  1. 3
    Aditi Sharma

    मैं आपकी तारीफ में वो लफ्ज़ खोज रही हूँ…..
    जो ये कह दे कि मुक्कमल हुई खोज तेरी….

    2+
  2. 4
    Vimal

    बेहतरीन, और ये पंक्ति तो मुझे बहुत ही उम्दा लगी ..
    “जो फकत दौलत से न मिले अब अपने लिए वोह इज्ज़त खोज रही हूँ।”

    #Couldn’t vote to your poem As I voted for mine.

    1+

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