ऐसा वो चंचल मन जब उड़ान भरता है

एक परिंदा जो हर रोज उड़ान भरता है,

खाने की नहीं, वो किसी और की तलाश में उड़ता है।

इतनी बड़ी दुनिया, इतने लोग,

फिर भी उसे है सुख, शांति और घनिष्ठ रिश्तों की खोज।

हाँ, हाँ! वही रिश्ते, वही नाते,

जो वादा करके भी लोग नहीं निभाते।

यूँ तो वो पिंजरे में बंद है,

जीने के लिए बचें लम्हें भी चंद है।

जिंदगी का है वो मारा,

पर कभी न थका, न हारा।

बिना पंख के उड़ान भरता है,

किसी मुश्किल से न वो ड़रता है।

ख्वाबों के पंख लगाकर,

तनहाइयों से यूँ इठलाकर।

आसमान में खुशियों के रंग भरे,

होकर दुनिया के हर दुख से परे।

वो पंछी आँखों को सुख देता है,

प्रेरणा देकर जिंदगी का हर गम एक पल में मिटा देता है।

ऐसा वो चंचल मन जब उड़ान भरता है,

तो आजाद परिंदे के समान सुंदर लगता है।

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