एक तिलिस्म — गुलज़ार साहब by Jaishree Rathore

मौका मिले तो एक शख्स को किसी तिलिस्मात से अपने वश में कर के, उनकी सुध-बुध भुला कर के, और उनके दिमाग को खोल कर देखें।

क्या पता जाने कौन सा कारखाना लगा रखा है उन्होनें शब्दों का, के एक-एक लव्ज़, जाने किस मशीन में ढल कर, पॉलिश हो कर, संवर कर निकलता है।

शब्दों के किस कलपुर्ज़े को कहाँ लगाना है, सजाना है, सब बखूबी पता है उनको. और जो भी नज़्म, शेर-शायरी की फसल होती है, उसका प्रोडक्ट कोड नंबर ही नहीं, बैच नंबर भी अलग होता है… हर फसल जुदा होती है।

अब चाहें जज़्बात की बात करें यां फिर दुनियादारी की, चाहे पश्मीने की बात करें याँ फिर आमपापड़ की, याँ फिर 316 चाँद की रातो के हिसाब की, सभी नयी पैदावार होती है। नयी तकनीक, नयी तासीर, नयी नवेली दुल्हन सरीन,…ख़ूबसूरत, नायब, दिलकश, कुछ पर्दानशीं, कुछ राजदार, कुछ कमसिन, कुछ अल्हड,..फिर भी संजीदा, भरोसेमंद, और गैरतपसंद..लगती है कभी-कभी बेहद लज़ीज़..थोड़ी मीठी, थोड़ी कुरकुरी, थोड़ी नमकीन,…कुछ कुछ दालचीनी जैसी..मीठी और ती-ती…‍‍‌‌‌‍

एक-एक हर्फ़ बेहद अज़ीज़, बेहद उम्दा, बेइन्तहा नायाब… हैं बागवान जिस गुल के गुलज़ार।

वो गुलज़ार, हां वो गुलज़ार बोलती है कलम जिनकी, चश्मे के कांच से x-ray सरीन भेदती हैं आंखें जिनकी ।

हाथ-घडी हाकिम मानिंद टटोलती है नब्ज़ उनकी, और बूझती है उसमे बहते गर्म लहू के मिजाज़ को, कि ना जाने अब क्या दास्ताँ बयां करती है लिखावट उनकी।

गर्म चाय से भरा माटी का सिकोरा लबों से लग कर उनके, एक अशआर खुद-ब-खुद बुनकर गुनगुना लेता है।
कलम से होती है दूसरे जहाँ की भाषा में इस जहाँ की बातें। हर लव्ज़ को पढ़ कर, सुनकर, मुंह से बरबस यही निकलता है..या रब्बा ये मझोले कद, गोरी रंगत, सफेद लिबास, सफ़ेद ज़ुल्फ़ लिए शख्स आदमजात है, या है जादूगर, तिलस्मै शब्दों का…

‘‘हम सब के आदरणीय गुलज़ार साहब को सादर नमन, एंवम समर्पित– प्रणाम।”

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